07 March 2007

माइक्रोसाफ्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम

09 March 2006

kavita

26 May 2005

हाइकु समीक्षा

  • अनुभूति का होली हाइकु अंक : एक प्रतिक्रिया
अनुभूति के होली अंक में हिन्दी हाइकु कविता की उपस्थिति सुखद लगी. इनमें अधिकतर प्रवासी भारतीयों के हिन्दी हाइकु हैँ। ये हाइकु देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा. जिन हाइकुकारों की हाइकु कविताओं का चयन किया गया है वे सभी बहुत अच्छे हाइकु हैं और स्वयं में परिपूर्ण हैं। ऍसा लगता है कि इन्हें अत्यंत सधे हुए हाइकुकारों ने रचा हैं. कुछ हाइकु जो मुझे अच्छे लगे प्रत्यक्षा का हाइकु—
टेसू के रंग
फागुन की उमंग
बौराया मन।
स्तरीय हाइकु है। टेसू के रंग और फागुन की उमंग जब ये दोनों मिल जाते हैं तो मन का बौराना स्वाभाविक है। इस मनः स्थिति को चित्रित करने में हाइकुकार को सफलता मिली है। लावण्या का हाइकु—
महुआ गंध
फागुन में उमंग
मन पतंग।
—सच ही है जब महुआ गंध और ‘फागुनी उमंग’ वातास में घुल जाती है तो मन कल्पनाओं के अश्व पर सवार हो जाता है। पतंग के समान विचरण करने लगता है। इसी भावानुभूति को बाँधने में हाइकुकार के सफल हुआ है। मनोशी चैटर्जी ने—
बिछा पलाश
फागुन बिखेरता
रंग गोधूली।
—में जो बिम्ब उकेरा है‚ वह दृश्य उसकी आँखों के समक्ष साकार हो उठेगा‚ जिसने पलाश वन देखा है, पलाश को फूलते और झड़-झड़ कर बिछते देखा है। पलाश —पुष्प झड़—झड़ कर ऍसे बिखर जाते हैं मानो रंगोली सजी हो। इस मखमली अहसास को बाँधने का हाइकु में सफल प्रयास किया गया हैं। अनूप भार्गव के हाइकु में फागुनी वातास के साथ—साथ कुछ गहन मानवीय चिन्तन जुड़ गया है जिसमें हाइकु गंभीर हो गया है। मातृभूमि की सुखद स्मृति और उससे जुड़ी तमाम यादें हमारे अन्तस में रची—बसी हैं। इनसे बिलग होना बड़ा कठिन हैँ। वास्तव में यह पीड़ा एक प्रवासी ह्रदय ही समझ सकता है—
फागुनी हवा
गुनगुनी-सी धूप
लौटना तो है।
राकेश खण्डेलवाल भी हाइकु में स्मृतियों को संजोकर प्रस्तुत करते हैं—
लौटे बहार
कब आपके साथ
प्रतीक्षा यही।
-मानव मात्र के बीच आपसी प्रेम-भाव बना रहें‚ इसका प्रयास साहित्य में हमेशा किया जाता है। देवी नंगरानी ने अपने हाइकु के द्वारा यही संदेश दिया है–
बीज खुशी के
खाद के संग प्यार
इसमें बो दो।
-दुनिया में सुख और शान्ति के लिए खुशी के बीज और उसमें प्यार की खाद हो तो निश्चय ही जो पौधे उगेंगे वे आपस में मिलकर रहेंगे। यही एक कवि की आकांक्षा है, यही हमारी संस्कृति है और यही हमने बचपन से सीखा है। नीलम जैन का हाइकु—
रंगों के ढ़ँग
लहरों का घुलना
नदिया संग ।
-जीवन के शाश्वत दर्शन को प्रतिबिम्बित करता है । सभी हाइकुकारों को अच्छे हाइकु लिखने के लिए बधाई । अंक की प्रस्तुति बहुत कलात्मक और प्रभावक ह। भविष्य में और श्रेष्ठ हाइकु कविताओं का सृजन करें यही आप सब से अपेक्षा है और यही शुभकामनाएँ भी ।
-डॉ॰ जगदीश व्योम
संपादक
हाइकु दर्पण

13 April 2005

ई गोष्ठी दि॰ १५ मई २००५

इंटरनेट पर हिन्दी के बढ़ते चरण
इंटरनेट पर हिन्दी का प्रयोग दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। एक समय था जब नेट पर हिन्दी बहुत कम देखने को मिलती थी, परन्तु आज स्थिति तेजी से बदली है। भारत के मध्य प्रदेश स्थित होशंगाबाद में इसी विषय को लेकर एक ई–गोष्ठी दिनांक १५–०५–२००५ को सायं ५ बजे स्थानीय ई पब्लिक लाइब्रेरी में की गई। गोष्ठी में यह दिखाने का प्रयास किया कि अन्तर्जाल पर हिन्दी की उपस्थिति को अधिकांश लोग सुनते तो रहते हैं पर देखते बहुत कम हैं, इसे सार्वजनिक रूप से देखा और दिखाया जाना चाहिये। किसी भी गाँव या शहर के साहित्यकार इंटरनेट पर अपनी कविताओं के माध्यम से आ सकते हैं, यह इस गोष्ठी में दिखाया गया और इस महान कार्य को विदेशों में रहकर करने वाले हिन्दी प्रेमी कर्मवीरों के द्वारा किए जाने वाले महत्वपूर्ण कार्यों की भी चर्चा की गई जिन्होने ब्लाग स्पाट के द्वारा हिन्दी प्रयोग के नए द्वार खोले हैं। इस आशय से डॉ॰ व्योम द्वारा तैयार किया गया होशंगाबाद के कवियों की कविताओं का काव्य संकलन नर्मदा तीरे का लोकार्पण कर प्रदर्शन किया गया। गोष्ठी की मुख्य अतिथि थीं होशंगाबाद की डिप्टी कलेक्टर श्रीमती अलका श्रीवास्तव और विशिष्ट अतिथि थे प्रतिभूति कागज कारखाना के प्रबंधक श्री राकेश कुमार। गोष्ठी में प्रवासी भारतीयों—प्रो॰ अश्विन गाँधी, पूर्णिमा वर्मन, देवाशीष, अतुल अरोरा एवं उनकी पूरी टीम, रमन कौल, जितेन्द्र चौधरी आदि की सराहना की गई। इन्हीं सब के प्रयास से इंटरनेट पर हिन्दी का प्रयोग सुलभ होता जा रहा है। हिन्दी के लिये प्रयुक्त हो रहे अनेक फोन्ट यदि एक फोन्ट के रूप में समाहित हो सकें तो फिर क्या कहने ........। यह अपेक्षा भी की गई। जी मेल पर हिन्दी में ई मेल की सुविधा, ब्लाग स्पाट पर हिन्दी का आसान प्रयोग होने से हिन्दी प्रयोग के क्षेत्र में नई क्रान्ति का सूत्रपात हुआ है। नर्मदा तीरे जैसे काव्य संकलन अन्य हिन्द प्रेमियों को इंटरनेट की ओर आकर्षित करेंगे। गोष्ठी में अनुभूति की संपादक पूर्णिमा वर्मन अपने वेब कैमरा के साथ उपस्थित थीं। इस अवसर पर अनुभूति, अभिव्यक्ति, अक्षरग्राम, निरंतर, कविता सागर, हिन्दी साहित्य, हाइकु दर्पण, हास्य महेश, हिन्दी कोंपल, गजलकमल, हिन्दी नेस्ट, होशंगाबाद के कवि, विमर्श, बालफुलबारी, नर्मदा तीरे आदि जाल पत्रकाओं को सभी ने देखा और इनकी भरपूर सराहना की।

विमर्श

हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत आज क्या लिखा जा रहा है और क्या जो कुछ लिखा जा रहा है उसे पढा भी जा रहा है या नहीं,। कितना प्रभावशाली है वर्तमान हिन्दी लेखन ऍसा क्या रह गया है जिसे आपके विचार से हिन्दी लेखन में आना चाहिए तथा ऍसा क्या है हिन्दी लेखन में जो बहुत अच्छा है।
यदि आपके मन में भी ऍसे प्रश्न उठते हैं तो आइए विमर्श में आपका स्वागत है।
विमर्श एक ऍसा मंच है जिसमें हिन्दी साहित्य पर खुलकर चर्चा होती है।
अब विमर्श में प्रतिमाह इण्टरनेट गोष्ठी होगी जिसमें महीने भर भाग लेने वालों के प्रश्नों विचारों आदि पर चर्चा और समीक्षा की जाएगी।
डा० जगदीश व्योम